संदेश

कबरिस्तान

युही अपने आप मे उलज जाओगे  तो कौन तुमसे दिल लगाने का बहाना बनायेगा ... युही हर ख्वाब को दिल मे दफओगे तो कौन इस कबरिस्तान से दिल लगायेगा... युही हर चमक से धोखा खाओगे  तो कौन आपको उस फकीर से मिलवायेगा ... युही जरा सी बात से आँखोंमे पानी भरोगे  तो कौन हर बार आपको बहालयेंगा    

औरत कि हि दुनिया

औरत कि हि दुनिया  वो सपने भी संजोदेगी  साथ सच करने देगी  हार कर गिरोगे तो  नया हौसला भी बांधयेगी ... उसके बिना  दुनिया ना देखोगे  फिर भी ऐसे कोसोगे  नरक उसे कहके  तुम क्या स्वर्ग देखोगे ... बिना शरीर के अपने क्या गुल खिलायोगे एस लोक कि परी को छोड  स्वर्ग कि अप्सरा के साथ  क्या गुलछरे उडायोगे ....   है नियत अगर साफ  क्यू  इतना डरते हो ... 'औरत कि हि दुनिया है प्यारे'  इस सच्चाई से  क्यू तुम भागते हो ...

बोल तेरा मै क्या बनू ?

बोल तेरा मै क्या बनू ? हर गम  का  इलाज  या फिर  घहरा सा जखम .... ओठो कि  हंसी  या फिर  बेदर्द चुभन .... खुशनुमा सा  एहसास   या फिर  हैराण सा पल ... नये सिरे कि  जिंदगी  या फिर  टूटा हुआ दर्पण .... चमकता किरण  आशा का  या फिर  दोपेहर कि तपीश ...   साथ  सादगी का  या फिर  आतंक का जहर ... तुषार 

भला इंसान

पंछी डाले डाल पर बसेरा  फिर भी प्यारा उसका हर सवेरा ...  हम सोये लेके रुई के तकीये गद्दे   ना चैन कि नींद ना खुशनुमा सवेरा ...  चुराये किसीका सामान  कोई गिरादे किसीका आशियाना कभी ना देखा किसी पंछी  चुराये किसी और पंछी का दाना... बेजुबा भेड़ को देखा  चलते एक कतार से....  न तू खुद संभाले  न तू संभाले सरकार से....  एकही चारा लेके  उड़े पंछी अपने घौसले...  कभी न आये थैली लेके  मांगे हात पसार और भर के ले ...   पंख फूटे तो उड़ जाये  कही और नया आसरा बनाये ...  पालनेवाले का न बोज  न पालनेवाला बोज बन जाये...  तुझे राह दिखाने  ते रे भगवान ने कितने  गीता कुरान लिखाये  बता कौनसा नक्श्या  उस परिंदे को  फिर खौसले तक लाये  बस अगर चलता जाये  तू अपनी मर्जी से  तो क्या करेगा   ये सविधान  चाये सब कुछ कर लेगा तू  पर कभी न बन  पायेगा तू भला इंसान  - तुषार

विचित्र

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भावनांची वाळवी

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गुन्हा

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संवाद

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कधी कधी

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गोजीरवाणे प्रेम

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खेळ मनाचा

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चारोळी

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चाहूल...

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अव्यक्त भावना

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पुसट आठवणी

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अर्थ

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प्रिये

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मी

मी  एका ध्येयपूर्तीसाठी अनंत वाटांच्या पायघड्या तुडवत चाललो मी एका स्वप्नपूर्तीच्या प्रेमात सगळे काही विसरत चाललो मी एका खोट्या आसक्तीच्या ओढीत ओढत चाललो मी एका वाढत चाललेल्या गर्दीत लुप्त होत चाललो मी एका अंधारातून उजेडाकडे जाताना सगळे प्रेमळ हात सोडत चाललो मी एका समाधानाच्या शोधात असमाधानी होत चाललो मी एका श्रीमंतीच्या वाटेवर मनाने गरीब होत चाललो मी एका शब्दात जगाच्या बाजारात स्वार्थी होत चाललो मी  ------ तुषार क्षीरसागर

मनाच्या अंतरंगातून

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